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जैविक/प्राकृतिक खेती

रासायनिक नहीं, जैविक सुरक्षा: ट्राइकोडर्मा से मिट्टी बनेगी स्वस्थ, फसल होगी समृद्ध

Ramjee Kumar Ramjee Kumar
Updated 7 January, 2026 9:31 AM IST
रासायनिक नहीं, जैविक सुरक्षा: ट्राइकोडर्मा से मिट्टी बनेगी स्वस्थ, फसल होगी समृद्ध

कृषि विश्वविद्यालय पूसा के वैज्ञानिक का दावा, मात्र ₹30 में किसान खुद तैयार कर सकते हैं शक्तिशाली जैविक प्रतिपक्षी


रासायनिक कवकनाशियों को कहें 'ना', ट्राइकोडर्मा से मिट्टी बनेगी रोगमुक्त और उपजाऊ: विशेषज्ञ


पूसा/समस्तीपुर। रसायनों पर बढ़ती निर्भरता, गिरती मिट्टी की उर्वरता और फसलों में लगातार लग रहे रोग—इन सभी चुनौतियों के बीच ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) किसानों के लिए एक भरोसेमंद जैविक समाधान बनकर उभरा है। यह कहना है प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह, विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, तथा पूर्व सह निदेशक (अनुसंधान), डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा का।


डॉ. सिंह के अनुसार ट्राइकोडर्मा न केवल मिट्टी को रोगमुक्त और जीवंत बनाता है, बल्कि पौधों की जड़ों को मजबूत कर फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता दोनों में सुधार लाता है।


क्या है ट्राइकोडर्मा?

ट्राइकोडर्मा एक लाभकारी सूक्ष्म कवक (फंगस) है, जो प्राकृतिक रूप से मिट्टी में पाया जाता है और पौधों की जड़ों के आसपास सक्रिय रहता है। यह एक प्रभावी जैविक प्रतिपक्षी (Biocontrol Agent) है, जो मिट्टी में रहने वाले हानिकारक फफूंदों को नियंत्रित करता है।


खेती में प्रचलित इसकी प्रमुख प्रजातियाँ हैं—

Trichoderma harzianum, Trichoderma viride / asperellum, Trichoderma koningii, इनमें से T. harzianum और T. viride का उपयोग सबसे अधिक किया जाता है।


कैसे करता है ट्राइकोडर्मा काम?

ट्राइकोडर्मा कई स्तरों पर फसलों की रक्षा करता है— रोगजनक फफूंदों के पोषक तत्व छीनकर उन्हें कमजोर करता है। हानिकारक फफूंद की कोशिकाओं पर हमला कर उन्हें नष्ट करता है। चिटिनेज़, ग्लूकनेज़ जैसे एंजाइम बनाकर रोगजनकों की कोशिका-भित्ति तोड़ता है। जड़ों की वृद्धि बढ़ाकर पौधों को मजबूत बनाता है। पौधों में प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक क्षमता विकसित करता है।


उद्यानिक फसलों में कैसे करें प्रयोग?

डॉ. सिंह बताते हैं कि ट्राइकोडर्मा का उपयोग फसल की अवस्था के अनुसार किया जा सकता है— बीज उपचार: 5–10 ग्राम प्रति किलो बीज, जिससे अंकुरण के समय लगने वाले रोगों से सुरक्षा मिलती है।


पौधशाला उपचार: मिट्टी में मिलाने या जड़ों पर पेस्ट लगाकर रोपाई करने से जड़ गलन व तना गलन से बचाव। मिट्टी उपचार: गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट के साथ मिलाकर खेत में प्रयोग। जड़ डिपिंग: रोपाई से पहले जड़ों को घोल में डुबोना, खासकर सब्जी और फल फसलों में प्रभावी। गड्ढा उपचार: फलदार पौधों के गड्ढों में जैविक खाद के साथ उपयोग।


किसानों को क्या-क्या लाभ?

रासायनिक कवकनाशियों पर निर्भरता घटती है। मिट्टी की जैविक सक्रियता और उर्वरता बढ़ती है।

फसलों में फ्यूजेरियम विल्ट, पिथियम, राइजोक्टोनिया, स्क्लेरोटियम जैसे रोगों पर नियंत्रण। पौधों की वृद्धि बेहतर होती है, जिससे उपज और गुणवत्ता बढ़ती है। पर्यावरण के अनुकूल और लागत में किफायती।


कुछ जरूरी सावधानियाँ भी

तेज धूप और सूखी मिट्टी में इसकी प्रभावशीलता कम हो जाती है। रासायनिक कवकनाशी के साथ तुरंत प्रयोग न करें; कम से कम 10–15 दिन का अंतर रखें। केवल प्रमाणित और जीवित ट्राइकोडर्मा उत्पाद ही खरीदें।


घर पर भी कर सकते हैं तैयार

डॉ. सिंह बताते हैं कि किसान भाई ट्राइकोडर्मा को कम लागत में स्वयं भी बहुगुणित (Multiply) कर सकते हैं। गोबर की खाद, चोकर और थोड़े से ट्राइकोडर्मा कल्चर से 7–10 दिनों में सक्रिय जैविक मिश्रण तैयार किया जा सकता है, जिसकी लागत मात्र ₹30–40 प्रति किलो आती है।


ट्राइकोडर्मा आज की टिकाऊ और जैविक कृषि का अहम हिस्सा बन चुका है। यह केवल एक जैविक कवकनाशी नहीं, बल्कि मिट्टी, पौधे और किसान—तीनों को सशक्त बनाने वाला एक मौन साथी है। यदि किसान इसे नियमित रूप से अपनाएं, तो रसायनों पर निर्भरता घटेगी, मिट्टी जीवंत बनेगी और खेती अधिक लाभकारी व सुरक्षित हो सकेगी।

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