बिहार के कृषि परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा जा रहा है, जहाँ सकरा क्षेत्र के प्रगतिशील किसान रौशन कुमार ने पारंपरिक फसलों के चक्र को तोड़कर गेंदा (मैरीगोल्ड) की व्यावसायिक खेती शुरू की है। ईएजीइनोवेशन एंड प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के अध्यक्ष कुमार, पारंपरिक खेती में घटते मुनाफे और जल संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रहे थे। उन्होंने अपनी छोटी जोत पर गेंदा उगाकर इन चुनौतियों का समाधान खोजा, जिसने उन्हें महज 60 से 70 दिनों में नियमित नकदी प्रवाह और प्रति एकड़ ₹1,00,000 तक का शुद्ध मुनाफा दिया है। यह पहल बिहार के हजारों छोटे और सीमांत किसानों के लिए फसल विविधीकरण की एक नई उम्मीद बनकर उभरी है।
कुमार के लिए निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने MFOI-ICAR दिल्ली में किसानों की सफलता की कहानियाँ सुनीं। पारंपरिक फसलें लंबी अवधि और अधिक पानी की मांग करती हैं, जो छोटे किसानों के लिए अलाभकारी साबित हो रही थीं। इसके विपरीत, गेंदा की फसल कम पानी में तैयार होती है और तेजी से मुनाफा देती है। आर्थिक विश्लेषण बताता है कि गेंदा की खेती की प्रति एकड़ लागत लगभग ₹35,000 से ₹59,800 तक आती है। यदि 40 क्विंटल प्रति एकड़ की रूढ़िवादी उपज और ₹40 प्रति किलोग्राम का औसत बाजार भाव (जो त्योहारों में ₹80 तक जाता है) माना जाए, तो शुद्ध मुनाफा ₹1 लाख प्रति एकड़ तक पहुंच जाता है। किसान पवन कुमार (बगही) ने भी अपने पहले प्रयास में सारे खर्च काटकर ₹30,000 का मुनाफा कमाया था।
गेंदा की खेती का अर्थशास्त्र यह भी दिखाता है कि यह एक श्रम-प्रधान फसल है, जिसमें कुल लागत का लगभग 46% हिस्सा मानव श्रम का होता है। यह बिहार जैसे श्रम अधिशेष वाले राज्य के लिए एक वरदान है, जो स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करता है। सफलता का रहस्य केवल सही फसल चुनना नहीं था, बल्कि उसे सही तरीके से उगाना भी था, जिसके लिए कुमार ने आत्मा, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) और पूसा विश्वविद्यालय से तकनीकी जानकारी का उपयोग किया। वैज्ञानिक पद्धतियों में बीज को सीधे बोने के बजाय नर्सरी तैयार करना, उचित जल निकास वाली दोमट मिट्टी का चयन करना और त्योहारों के समय को ध्यान में रखकर रोपण करना शामिल है।
तकनीकी दृष्टिकोण से, ईएजीइनोवेशन ने पाया कि प्रति इकाई क्षेत्र में कुल उपज अधिकतम करने के लिए 40x20 सेमी की सघन दूरी आदर्श है। इसके अलावा, गेंदा की फसल मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह ट्रैप क्रॉप के रूप में कार्य करते हुए हानिकारक नेमाटोड को नियंत्रित करती है, जिससे अगली सब्जी फसलों में कीटनाशकों की लागत कम होती है। किसान प्रभा देवी के मॉडल से प्रेरित होकर, रौशन कुमार के समूह ने केवल फूल बेचने के बजाय माला गूंथकर मूल्य संवर्धन (value addition) करना शुरू कर दिया, जिससे प्रति फूल का मूल्य कई गुना बढ़ गया।
बिहार सरकार एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत गेंदा की खेती पर 50% से 70% तक की भारी सब्सिडी प्रदान कर रही है, जिसमें ₹40,000 प्रति हेक्टेयर का अनुदान शामिल है। इसके अतिरिक्त, फूलों को मंडी तक पहुंचाने के लिए मालवाहक वाहनों पर भी सब्सिडी की योजना है। हालांकि, कुमार और उनके समूह का अनुभव चौंकाने वाला है। उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं के बावजूद, उन्हें कृषि विभाग से अब तक किसी प्रकार की मदद नहीं मिली है, जो सरकारी सहायता और ज़मीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर करता है। उनकी सफलता मुख्य रूप से उनकी अपनी उद्यमशीलता और बाजार की गहरी समझ का परिणाम है, न कि सरकारी सहायता का। गेंदा की खेती, अगर सरकार और उद्यमी किसान दोनों मिलकर काम करें, तो बिहार के कृषि क्षेत्र में स्थायी समृद्धि का आधार बन सकती है।