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खेती-बाड़ी

भूजल स्तर को बढ़ावा देने हेतु वर्षा जल संचयन एक आवश्यक उपाय

AgriPress Staff AgriPress Staff
Updated 6 July, 2025 9:21 PM IST
भूजल स्तर को बढ़ावा देने हेतु वर्षा जल संचयन एक आवश्यक उपाय

भूजल संकट की बढ़ती समस्या को देखते हुए वर्षा जल संचयन अब समय की माँग बन चुकी है। इसी उद्देश्य को लेकर कृषि विज्ञान केंद्र, जाले (दरभंगा) की ओर से एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन 01 जुलाई 2025 को ब्रह्मपुर गाँव, जाले प्रखंड में किया गया। प्रशिक्षण का संचालन कृषि अभियंत्रण विशेषज्ञ ई. निधि कुमारी ने किया।


इस मौके पर ई. निधि कुमारी ने किसानों को बताया कि वर्षा जल संचयन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें वर्षा के जल को बर्बाद होने से बचाकर उसे पुनः उपयोग के लिए संरक्षित किया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि हर किसान वर्षा जल को सही तरीके से संरक्षित करना शुरू कर दे, तो न केवल सिंचाई के लिए वैकल्पिक जल स्रोत मिलेंगे, बल्कि क्षेत्र के गिरते भूजल स्तर में भी सुधार होगा।



रूफटॉप वाटर हार्वेस्टिंग तकनीक की जानकारी

प्रशिक्षण के दौरान निधि कुमारी ने रूफटॉप वाटर हार्वेस्टिंग तकनीक को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि घरों और इमारतों की छतों पर वर्षा जल को पाइप के माध्यम से फिल्टर कर जमीन में प्रवाहित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया से न केवल जल की बर्बादी रुकती है, बल्कि यह भूजल पुनर्भरण के लिए भी बेहद उपयोगी होती है। यह प्रणाली लागत में किफायती होती है और लंबे समय तक उपयोग में लाई जा सकती है।


खेतों में तालाब और डीप परकोलेशन टैंक का सुझाव

इसके अतिरिक्त, उन्होंने किसानों को खेतों में छोटे तालाब या डीप परकोलेशन टैंक बनाने की सलाह दी। इससे वर्षा का जल खेत में ही जमा होकर धीरे-धीरे भूमि में समाहित हो जाता है, जिससे भूमि की नमी बनी रहती है और भूजल का स्तर भी सुधरता है। वर्षा जल के पुनर्भरण से वाष्पीकरण की हानि भी रोकी जा सकती है और जल लंबे समय तक संरक्षित रहता है।


30 से अधिक महिला कृषकों की भागीदारी

इस कार्यक्रम में 30 से अधिक महिला किसान उपस्थित रहीं। सभी प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण के अंत में वर्षा जल संचयन को लेकर संकल्प लिया कि वे अपने-अपने खेतों और घरों में इन तकनीकों को अपनाएंगी।


प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों ने कृषि विज्ञान केंद्र की इस पहल की सराहना की और इस तरह के कार्यक्रमों को गाँव-गाँव तक पहुंचाने की मांग की, ताकि अधिक से अधिक किसान जागरूक हो सकें।

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