डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा, एक बार फिर गंभीर विवादों में घिर गया है। विश्वविद्यालय के विजिटर और देश के राष्ट्रपति को एक अभ्यावेदन भेजकर सामाजिक कार्यकर्ता एवं बिहार स्वाभिमान संघ के अध्यक्ष सुनील कुमार ने आरोप लगाया है कि कुलपति अधूरे बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट (बीओएम) से अवैध अनुमोदन ले रहे हैं, जिसके कारण नियुक्तियों और निर्णयों की पारदर्शिता पर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
अपूर्ण बीओएम से फैसले
अभ्यावेदन के अनुसार, बीओएम के कुल सदस्यों में से लगभग आठ सदस्य अभी तक नामित या नियुक्त नहीं हैं। इनमें कुलाध्यक्ष और विजिटर (राष्ट्रपति) द्वारा नामित व्यक्ति भी शामिल हैं। इसके बावजूद मई 2025 में अधूरी बीओएम बैठक बुलाकर कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। सुनील कुमार ने कहा कि यह प्रथा विश्वविद्यालय अधिनियम और संविधि के खिलाफ है। उन्होंने दावा किया कि अधूरे बीओएम से लिए गए अनुमोदन न सिर्फ अवैध हैं बल्कि विश्वविद्यालय की निर्णय प्रक्रिया की पवित्रता और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करते हैं।
नियुक्तियों पर सवाल
अभ्यावेदन में कहा गया है कि मई 2025 की बीओएम बैठक में सहायक प्रोफेसर के रूप में डॉ. कुमार राज्यवर्धन और तुषार पांडे जैसी नियुक्तियां कर दी गईं, जिन्हें अवैध बताया गया है। इसके अलावा, ओबीसी पदों पर नियुक्तियों के दौरान केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित प्रारूप की बजाय राज्य द्वारा जारी प्रमाणपत्रों को मान्यता दी गई। सबसे गंभीर आरोप यह है कि 43 सहायक प्रोफेसर नियुक्तियों में से 34 एक ही जाति विशेष से संबंधित हैं और वे कुलपति डॉ. पी.एस. पांडे की ही जाति के हैं। अभ्यावेदन में इसे "सामाजिक न्याय और योग्यता पर कुठाराघात" कहा गया है।
सामाजिक कार्यकर्ता की मांगें
सुनील कुमार ने राष्ट्रपति से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें हैं —
1. अपूर्ण बीओएम से लिए गए सभी फैसलों को अवैध घोषित किया जाए।
2. विजिटर और कुलाध्यक्ष द्वारा नामित सभी लंबित सदस्यों की नियुक्ति कर बोर्ड को पूर्ण किया जाए।
3. अब तक हुई नियुक्तियों और अनुमोदनों की जांच की जाए।
4. विश्वविद्यालय का संचालन अधिनियम और नियमों के अनुरूप सुनिश्चित किया जाए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा
आरपीसीएयू, पूसा देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थानों में से एक है। यहां की नीतियां और फैसले सीधे छात्रों, शोधकर्ताओं और किसानों को प्रभावित करते हैं। इसलिए बीओएम की पारदर्शिता और अखंडता को लेकर उठ रहे सवाल गंभीर महत्व रखते हैं।