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जैविक/प्राकृतिक खेती

पसीना सूख रहा है, आस टूट रही है: किसान जलवायु संकट के सबसे बड़े शिकार

Raushan Kumar Raushan Kumar
Updated 1 September, 2025 1:11 PM IST
पसीना सूख रहा है, आस टूट रही है: किसान जलवायु संकट के सबसे बड़े शिकार

किसान की आजीविका का आधार उसका शारीरिक श्रम और मेहनत है। जब मौसम उसकी मेहनत को व्यर्थ कर देता है, तो इसका असर केवल उसकी आय पर नहीं, बल्कि उसके शरीर और मनोबल पर भी पड़ता है।


बढ़ती गर्मी का सीधा असर

जलवायु परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला प्रभाव किसानों की श्रम उत्पादकता में गिरावट है। अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि बढ़ते तापमान के कारण सदी के अंत तक भारतीय किसानों की श्रम उत्पादकता 43% तक गिर सकती है । इसका मतलब है कि एक किसान पैदावार के मौसम में जितना काम कर सकता है, उसका केवल 57% ही कर पाएगा । और यदि सबसे गर्म 90 दिनों की बात करें तो यह गिरावट 73% तक हो सकती है, यानी उनकी क्षमता महज 27% रह जाएगी । वर्तमान में भी, किसान अपनी क्षमता से 23% कम काम कर पा रहे हैं । यह डेटा बताता है कि जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ फसल पर नहीं, बल्कि किसान के शरीर और उसकी काम करने की क्षमता पर भी पड़ रहा है।  


यह एक गहरा दुष्चक्र बनाता है: कम श्रम उत्पादकता का मतलब है कम काम, और कम काम का मतलब है कम कमाई। जब किसान अपनी मेहनत (पसीना) का फल (फसल) मौसम की मार से बर्बाद होते देखता है, तो उसकी भविष्य की उम्मीद (आस) भी टूट जाती है। यह एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संबंध है। यह केवल एक आर्थिक गणना नहीं है, बल्कि किसान के मनोबल पर एक सीधा प्रहार है।


स्वास्थ्य संबंधी खतरे

कृषि श्रमिक जलवायु संबंधी कई स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करते हैं। इनमें अत्यधिक गर्मी, कीटों की बढ़ती संख्या के कारण कीटनाशकों का अधिक उपयोग, मच्छरों और अन्य रोगाणुओं वाले कीटों का बढ़ना और खराब वायु गुणवत्ता शामिल हैं । बदलते मानसून पैटर्न से डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है । ये सभी कारक मिलकर किसान के शारीरिक स्वास्थ्य को कमजोर कर रहे हैं, जिससे उसकी कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।  


आस का टूटना और बढ़ता मानसिक बोझ

जब किसान की मेहनत और स्वास्थ्य पर मौसम का प्रहार होता है, तो इसका सबसे बड़ा परिणाम उसकी आस का टूटना और उस पर पड़ने वाला मानसिक बोझ होता है। यह बोझ आर्थिक नुकसान, कर्ज और भविष्य की अनिश्चितता के रूप में सामने आता है।


आर्थिक दबाव और कर्ज का जाल

अनिश्चित मौसम के कारण फसलें या तो जल्दी पक जाती हैं या देर से, जिससे उनकी गुणवत्ता और मात्रा दोनों प्रभावित होती हैं । लगातार नुकसान से किसान हताश हो रहे हैं और खेती छोड़ने या अपनी जमीन किसी निजी कंपनी को देने पर मजबूर हो रहे हैं । उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के एक किसान शैलेंद्र शुक्ला की कहानी इसका प्रमाण है, जिन्हें लगातार नुकसान के बाद अपनी जमीन का एक बड़ा हिस्सा एक निजी कंपनी को देना पड़ा, ताकि उन्हें एक निश्चित वार्षिक आय मिल सके । किसान विवेक कुमार की कहानी भी यही बताती है कि उन्हें अपनी फसल कटने से पहले हुई बेमौसम बारिश के कारण अपने लिए गेहूँ खरीदना पड़ा, जबकि वह उसे खुद उगाते थे । खेती की बढ़ती लागत (बीज, उर्वरक, कीटनाशक) और अनिश्चित पैदावार के कारण किसानों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है, जो उन्हें एक गहरे जाल में फंसा देता है ।  


बढ़ती हताशा और आत्महत्या का भयावह सच

यह आर्थिक और मानसिक दबाव कई बार इतना बढ़ जाता है कि किसान अपनी जान लेने पर मजबूर हो जाता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में भारत में 5,318 किसानों और 5,563 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की । यह दुखद आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है । किसान आत्महत्याओं के पीछे सिर्फ फसल का नुकसान नहीं, बल्कि नुकसान के कारण उपजा कर्ज और भविष्य के प्रति गहरी हताशा है। यह समझना आवश्यक है कि 86% छोटे और सीमांत किसान इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित क्यों हैं । उनके पास वित्तीय सुरक्षा का अभाव होता है, और एक भी फसल की विफलता उन्हें पूरी तरह से दिवालिया कर सकती है।  


आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु जैसे पाँच राज्य कुल किसान आत्महत्याओं का लगभग 85% हिस्सा हैं । यह दर्शाता है कि इन क्षेत्रों में विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय कमजोरियां मौजूद हैं, जिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। यह दुखद सच्चाई बताती है कि जलवायु परिवर्तन और आर्थिक संकट किसानों के लिए जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन गए हैं।  


सारणी 2: भारत में किसान आत्महत्याओं के आंकड़े (2017-2021)

स्रोत: एनसीआरबी रिपोर्ट 2021  


महिलाओं पर दोहरा बोझ

जलवायु संकट का सबसे अधिक असर महिला किसानों पर भी देखने को मिल रहा है। जब प्राकृतिक आपदाएं आती हैं तो अक्सर पुरुष आजीविका की तलाश में दूसरे स्थानों पर चले जाते हैं, जिससे खेती और घर-गृहस्थी की पूरी जिम्मेदारी महिला किसानों पर आ जाती है । सूखे की स्थिति में उन्हें पीने के पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जबकि बाढ़ की स्थिति में उन्हें गुणवत्तापूर्ण पानी उपलब्ध कराने की चिंता रहती है । इन चुनौतियों का उनके शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ता है । यह दर्शाता है कि जलवायु संकट ने ग्रामीण समाज में महिलाओं की भूमिका और संघर्ष को और भी जटिल बना दिया है।  


उम्मीद की किरण: समाधान और आगे की राह

इस विकट परिस्थिति में, केवल समस्याओं को जानना पर्याप्त नहीं है। समाधानों की तलाश और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना अत्यंत आवश्यक है। सौभाग्य से, सरकार और वैज्ञानिक समुदाय इस दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इन प्रयासों का दोहरा उद्देश्य है: तात्कालिक राहत प्रदान करना और किसानों को भविष्य के लिए 'जलवायु-अनुकूल' और अधिक 'लचीला' बनाना।


जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियाँ

किसानों को ऐसी कृषि पद्धतियाँ अपनाने की सलाह दी जा रही है जो बदलते मौसम का सामना कर सकें


फसल विविधीकरण: बाजरा, रागी, ज्वार और अन्य मोटे अनाज जैसी फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो तापमान और वर्षा के उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक सहनशील होती हैं ।  

संरक्षण कृषि: 'जीरो टिलेज' यानी बिना जुताई वाली खेती की तकनीक को प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह मिट्टी के कटाव को कम करने, उसकी उर्वरता बनाए रखने और बुवाई में लगने वाले समय को बचाने में मदद करती है ।  

कृषि वानिकी: फसलों और पशुपालन के साथ-साथ पेड़ों और झाड़ियों को एकीकृत करने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और जल धारण क्षमता में सुधार होता है ।  

जैविक खेती: परम्परागत कृषि विकास योजना के तहत जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है । यह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने और मिट्टी के स्वास्थ्य को सुधारने में मदद करती है ।  


जल प्रबंधन के आधुनिक तरीके

जल संकट से निपटने के लिए आधुनिक सिंचाई तकनीकें एक महत्वपूर्ण समाधान बनकर उभरी हैं

ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई: ये पद्धतियाँ जल की कमी वाले क्षेत्रों में विशेष रूप से उपयोगी साबित हुई हैं । प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत 'हर बूंद अधिक फसल' के सिद्धांत पर काम करते हुए इन तकनीकों को अपनाने पर वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।  

वर्षा जल संचयन: वर्षा के पानी को इकट्ठा कर टैंकों में जमा करना और सूखे के समय उसका उपयोग करना भी एक कारगर तरीका है।  


सरकार की पहलें और योजनाएं

भारत सरकार ने किसानों को जलवायु संकट से बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की हैं

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): यह योजना प्राकृतिक आपदाओं, कीटों और बीमारियों से होने वाले फसल के नुकसान से सुरक्षा प्रदान करती है । यह बुवाई से लेकर कटाई के बाद तक के जोखिमों को कवर करती है और कम प्रीमियम पर किसानों को पूरी बीमित राशि प्रदान करने का वादा करती है ।  

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): इसका मुख्य उद्देश्य 'हर खेत को पानी' पहुंचाना और जल उपयोग की दक्षता को बढ़ाना है ।  

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY): यह योजना कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के विकास के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिससे वे स्थानीय जरूरतों के अनुसार अपनी कृषि योजनाएं बना सकें ।  

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA): इस मिशन का उद्देश्य भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीला बनाने के लिए रणनीतियाँ विकसित करना है।  


जलवायु-अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (NICRA): भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा शुरू की गई यह परियोजना रणनीतिक अनुसंधान के माध्यम से भारतीय कृषि के लचीलेपन को बढ़ाती है।  


ये योजनाएं न केवल आर्थिक सहायता दे रही हैं, बल्कि किसानों को नई तकनीक और ज्ञान से सशक्त बना रही हैं ताकि वे अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकें।  


सारणी 3: जलवायु-अनुकूल सरकारी योजनाएं और उनके लाभ


मिलकर लड़ेंगे तो जीतेंगे

भारत का किसान आज एक ऐसे संकट का सामना कर रहा है, जो उसकी सदियों की मेहनत, उसके शारीरिक बल और उसकी उम्मीदों को एक साथ चुनौती दे रहा है। यह केवल फसल का नुकसान नहीं, बल्कि एक पीढ़ीगत संघर्ष है। जलवायु परिवर्तन ने खेती को एक जोखिम भरा पेशा बना दिया है, जहाँ निवेश की लागत और रिटर्न की अनिश्चितता ने किसानों को गहरे दबाव में डाल दिया है। किसान की हताशा और बढ़ती आत्महत्याओं के भयावह आंकड़े इसी संकट की गंभीरता को दर्शाते हैं।


हालांकि, यह लड़ाई असंभव नहीं है। सरकार की पहलें, जैसे फसल बीमा और सिंचाई योजनाएं, तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान करने की कोशिश कर रही हैं। इसके साथ ही, जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियाँ और तकनीकों को अपनाना किसानों को इस चुनौती से निपटने के लिए सशक्त कर रहा है। यह एक सामूहिक प्रयास है, जिसमें किसानों, वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और समाज के हर वर्ग को एकजुट होना होगा। जब किसान अपनी जमीन पर पसीना बहाता है, तो उसे उम्मीद होती है कि आसमान उसका साथ देगा। आज जब आसमान का मिजाज बदला है, तो हमें मिलकर उसका साथ देना होगा। जब तक हम किसान की मेहनत और उसकी आस को एक साथ नहीं थामेंगे, तब तक यह संकट कम नहीं होगा। सामूहिक इच्छाशक्ति और समन्वित प्रयासों से ही हम इस संकट को पार कर सकते हैं और भारत के अन्नदाता की जिंदगी और भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं।

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