भारत का किसान आसमान को अपना सबसे बड़ा मित्र और मार्गदर्शक मानता आया है। वर्षा की बूंदें उसके लिए केवल पानी नहीं, बल्कि जीवन का वरदान थीं, जो उसकी कड़ी मेहनत को फल में बदलती थीं। सदियों से चला आ रहा यह भरोसा और संबंध अब खतरे में है। जिस आसमान से जीवन की आस थी, वही अब अपने बदलते मिजाज से कहर बनकर बरस रहा है। कहीं बेमौसम बारिश फसलों को डुबो रही है तो कहीं लंबे सूखे खेत की नमी छीन रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ मौसम का नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों की जिंदगी और उनकी उम्मीदों का है। यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि उस पसीने, उस मेहनत और उस टूटती आस का प्रतिबिंब है, जो भारत के अन्नदाता के जीवन का हिस्सा बन गई है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि सभ्यता का आधार है। देश का लगभग 51% कृषि क्षेत्र सीधे तौर पर वर्षा पर निर्भर है, जो कुल कृषि उत्पादन में 40% का योगदान देता है । इसके अलावा, भारत की लगभग 47% आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर करती है, और यह क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 16% का योगदान देता है । जब जलवायु परिवर्तन इस आधार पर प्रहार करता है, तो यह केवल फसलों का नुकसान नहीं होता, बल्कि करोड़ों लोगों की जीवन रेखा टूटती है। यह संकट केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि एक गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट भी है। किसान का पारंपरिक ज्ञान, जो पीढ़ियों से मौसम के संकेतों को पढ़कर बुआई और कटाई का समय तय करता था, अब व्यर्थ हो रहा है। जब किसान देखता है कि उसकी वर्षों की समझ और मेहनत बेमौसम की मार से एक झटके में बर्बाद हो जाती है, तो उसका विश्वास टूट जाता है। यह रिपोर्ट इसी टूटे हुए विश्वास, परिश्रम के व्यर्थ होने और भविष्य की अनिश्चितता के दर्द को समझने का एक प्रयास है।
मौसम का मिजाज और फसलों पर मार
जलवायु परिवर्तन का सबसे सीधा और विनाशकारी प्रभाव कृषि पर ही देखने को मिल रहा है। यह प्रभाव सिर्फ तापमान में वृद्धि या कम बारिश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को अस्त-व्यस्त कर दिया है।
असंतुलित वर्षा का जाल
भारतीय मानसून, जिसे देश की जीवन रेखा कहा जाता है, अब पहले की तरह विश्वसनीय नहीं रहा । इसका स्वरूप अप्रत्याशित हो गया है। हाल के अध्ययनों के अनुसार, मानसूनी हवाएँ कमजोर पड़ रही हैं, और अल नीनो जैसे वैश्विक पैटर्न के कारण भारत में वर्षा के वितरण में भारी बदलाव आया है । इसका परिणाम यह है कि जहाँ पहले अत्यधिक वर्षा होती थी, वहाँ अब कम बारिश हो रही है और जहाँ कम होती थी, वहाँ बाढ़ की स्थिति बन रही है ।
पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में, जहाँ पारंपरिक रूप से अच्छी बारिश होती थी, वहाँ अब जुलाई के पहले सप्ताह के बाद मानसून की बेरुखी से फसलें सूख रही हैं। भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इन क्षेत्रों में 1 जून से 16 सितंबर, 2022 के बीच सामान्य से 17% कम वर्षा दर्ज की गई, जबकि इसी अवधि में मध्य भारत में सामान्य से 20% और दक्षिणी क्षेत्रों में 31% अधिक वर्षा हुई । इस असंतुलन के कारण बिहार और असम जैसे बाढ़-प्रवण राज्यों में अत्यधिक मानसूनी बारिश ने धान की फसलों को नष्ट कर दिया है, वहीं पंजाब और हरियाणा में बेमौसम बारिश से गेहूं का उत्पादन कम हुआ है । एक ही वर्ष में देश के अलग-अलग हिस्सों में सूखे और बाढ़ की दोहरी मार देखने को मिल रही है । यह स्थिति पारंपरिक कृषि पद्धतियों को पूरी तरह से बाधित कर रही है और किसानों के लिए एक अदृश्य संकट पैदा कर रही है, क्योंकि राष्ट्रीय औसत में यह क्षेत्रीय असमानता छिप जाती है।
बढ़ता तापमान और घटती उपज
बढ़ता तापमान फसलों की पैदावार और गुणवत्ता पर सीधा असर डाल रहा है। अध्ययनों से पता चलता है कि तापमान में प्रत्येक 1°C की वृद्धि से गेहूं की उत्पादकता में 4-5% की गिरावट आ सकती है, जबकि चावल और मक्का जैसी फसलों को भी समान नुकसान हो रहा है । अनुमान है कि 2050 तक गेहूं की पैदावार में 19.3% और 2080 तक 40% तक की कमी आ सकती है । इसी तरह, वर्षा आधारित चावल की उत्पादकता 2080 तक 47% तक कम होने का अनुमान है ।
फसल की पैदावार में कमी के साथ-साथ उसकी पोषण गुणवत्ता भी घट रही है। अत्यधिक गर्मी के कारण फसलों में प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों की कमी हो रही है, जिससे अंततः मनुष्यों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है । हिमाचल प्रदेश में सेब की खेती इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। बढ़ते तापमान के कारण सेब के बागान अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित हो रहे हैं, और अनुमान है कि 2030 तक सेब की फसल में 4% तक की गिरावट आ सकती है । यह दिखाता है कि तापमान वृद्धि केवल पैदावार की मात्रा ही नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर रही है, जो एक बड़ा जोखिम है।
प्रमुख फसलों की पैदावार पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
गेहूं - 1°C तापमान वृद्धि से उत्पादकता में 4-5% की गिरावट 2050 तक पैदावार में 19.3% और 2080 तक 40% की कमी
धान - 2°C तापमान वृद्धि पर प्रति हेक्टेयर 0.75 टन की कमीवर्षा आधारित चावल की उत्पादकता में 2080 तक 47% तक की कमी का अनुमान
मक्का - खरीफ मक्का की पैदावार में कमी का अनुमान
सेब - बढ़ते तापमान से उत्पादन में कमी और बागानों का उच्च क्षेत्रों में स्थानांतरण
मिट्टी और जल का क्षरण
जलवायु परिवर्तन का असर केवल फसलों पर नहीं, बल्कि खेती के मूल आधार – मिट्टी और पानी – पर भी हो रहा है। सूखे और बाढ़ दोनों ही स्थितियों में मिट्टी का कटाव होता है, जिससे उसकी उपजाऊ ऊपरी परत नष्ट हो जाती है । जहां बाढ़ उपजाऊ मिट्टी को बहा ले जाती है, वहीं सूखा और तेज हवाएं धूल के रूप में इसे उड़ा देती हैं । इसके साथ ही, बढ़ता तापमान मिट्टी की नमी और कार्यक्षमता को प्रभावित करता है, जिससे मिट्टी में लवणता बढ़ती है और उसकी जैव विविधता घटती है ।
देश के जल संसाधन भी तेजी से सिकुड़ रहे हैं । नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में कमी आ रही है और भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है । एक तरफ पानी की उपलब्धता कम हो रही है, वहीं दूसरी तरफ सिंचाई के लिए पानी की मांग बढ़ रही है, जिससे यह समस्या और ग।
नए रोग और कीटों का प्रकोप
बदलती जलवायु में कीटों और बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ रहा है। गर्म और नम मौसम कीटों की प्रजनन क्षमता को बढ़ा देता है, जिससे उनकी संख्या में भारी वृद्धि होती है और वे फसलों को अधिक नुकसान पहुँचाते हैं । इसका एक उदाहरण चने में 'शुष्क जड़ सड़न' (Dry Root Rot) रोग है, जिसका प्रकोप 30 से 35°C के उच्च तापमान और सूखे की स्थिति में तेजी से बढ़ता है । ऐसे नए और पुराने रोगों का प्रकोप, जिनके लिए किसान तैयार नहीं होते, अचानक फसल को बर्बाद कर सकता है, जिससे किसानों का वित्तीय नुकसान और भी बढ़ जाता है।
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