बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (Bihar Animal Sciences University) के अंतर्गत बिहार पशु चिकित्सा महाविद्यालय में शुरू किए गए नए पारावेटरिनरी पाठ्यक्रमों को पूरे राज्य से जबरदस्त समर्थन मिल रहा है। नवप्रवेशी छात्रों के लिए पटना स्थित बिहार पशु चिकित्सा महाविद्यालय परिसर में एक वृहद ओरिएंटेशन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान यह जानकारी दी गई कि इन कौशल आधारित पाठ्यक्रमों में बिहार के 38 में से 30 जिलों के छात्रों ने नामांकन कराया है, जो यह दर्शाता है कि पशुपालन से जुड़े कौशल आधारित पढ़ाई के लिए युवाओं में खासा उत्साह है।
ये पाठ्यक्रम राज्य सरकार के डेयरी, मत्स्य और पशु संसाधन विभाग की पहल पर शुरू किए गए हैं। छात्रों ने दाखिला लेकर यह साबित कर दिया है कि वे पशुधन विकास के क्षेत्र में अपना भविष्य संवारना चाहते हैं।
सीटें लगभग फुल, दूर-दराज के छात्रों की भागीदारी
पशुधन विकास से जुड़ा डिप्लोमा पाठ्यक्रम, जो पटना और किशनगंज स्थित पशु चिकित्सा महाविद्यालयों में चल रहा है, उसमें कुल 60 सीटों के मुकाबले 54 छात्रों ने दाखिला लिया है। ये छात्र बिहार के 26 जिलों से आए हैं। इसी तरह, पशु चिकित्सा प्रयोगशाला तकनीक के डिप्लोमा में 30 सीटों के विरुद्ध 21 छात्रों का नामांकन हुआ है, जो 13 जिलों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण, कृत्रिम गर्भाधान के प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम के 2 बैचों में कुल 40 सीटों पर 27 छात्रों ने प्रवेश लिया है, जो 17 जिलों से हैं।
ओरिएंटेशन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. इंद्रजीत सिंह थे। उनके साथ बिहार पशु चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. जे. के. प्रसाद, किशनगंज पशु चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. चंद्रहास, प्रवेश समिति के अध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार और पारावेटरिनरी विज्ञान विद्यालय के प्रमुख डॉ. रमेश तिवारी सहित कई शिक्षक मौजूद रहे।
पशु स्वास्थ्य और नस्ल सुधार पर जोर
कुलपति डॉ. इंद्रजीत सिंह ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि बिहार में पहली बार शुरू किए गए ये पाठ्यक्रम पशुपालन क्षेत्र के लिए बड़ा बदलाव लाने वाले हैं। उन्होंने बताया कि पढ़ाई में आधुनिक पशु चिकित्सा के साथ-साथ परंपरागत और घरेलू उपचार पद्धतियों को भी शामिल किया गया है, ताकि किसानों को कम खर्च में उनके गांव और घर के पास ही पशु स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।
उन्होंने विशेष रूप से कृत्रिम गर्भाधान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इसका प्रशिक्षण लेने वाले युवाओं से पशुओं की नस्ल सुधार में बड़ी मदद मिलेगी, क्योंकि दूध उत्पादन का लगभग 75% हिस्सा पशुओं की आनुवंशिक क्षमता पर निर्भर करता है। सही ढंग से रिकॉर्ड रखने से किसान अपने ही पशुओं से अच्छी नस्ल तैयार कर पाएंगे और उन्हें बेहतर दाम भी मिलेंगे।
रोजगार के बनेंगे बड़े अवसर
इस मौके पर किशनगंज पशु चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. चंद्रहास ने कहा कि बिहार में हर साल लगभग 3 करोड़ कृत्रिम गर्भाधान की आवश्यकता होती है। इससे इस क्षेत्र में काम करने वाले प्रशिक्षित लोगों के लिए रोजगार और आमदनी के अच्छे मौके बनते हैं। उन्होंने कहा कि पशुधन विकास और प्रयोगशाला तकनीक के डिप्लोमा करने वाले छात्रों के लिए भी इलाज, जांच, विस्तार सेवाओं और मैदानी स्तर पर काम के कई अवसर मौजूद हैं।
बिहार पशु चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. जे. के. प्रसाद ने यह स्पष्ट किया कि इन पाठ्यक्रमों से पढ़कर निकलने वाले छात्र निजी क्षेत्र के साथ-साथ राज्य सरकार के पशु अस्पतालों और विश्वविद्यालय से जुड़े संस्थानों में भी काम कर सकेंगे। उन्होंने बताया कि छात्रों को एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड जैसी आधुनिक जांच सुविधाओं का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे जिला स्तर पर पशु चिकित्सा सेवाएं और मजबूत होंगी।
कार्यक्रम के अंत में पारावेटरिनरी विज्ञान विद्यालय के प्रमुख डॉ. रमेश तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापन देते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन और सभी शिक्षकों के सहयोग के लिए आभार जताया।