भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईओआर), हैदराबाद ने हाल ही में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची में आयोजित अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपी) कुसुम एवं तीसी की वार्षिक समीक्षा बैठक में बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर को “बेस्ट एआईसीआरपी–तीसी केंद्र पुरस्कार 2024-25” प्रदान किया है। यह प्रतिष्ठित सम्मान तीसी (Linum usitatissimum L.) में जर्मप्लाज्म सुधार, जलवायु-सहनशील एवं रोग-प्रतिरोधी किस्मों के विकास, और नैनो-प्रौद्योगिकी आधारित उत्पादन तकनीक में बीएयू सबौर के उत्कृष्ट योगदान को मान्यता देता है।
बीएयू सबौर के निदेशक अनुसंधान, अनिल कुमार सिंह के रणनीतिक नेतृत्व और वैज्ञानिक मार्गदर्शन में यह उच्च स्तरीय शोध कार्य संचालित किया गया। परियोजना के मुख्य अन्वेषक आर.बी.पी. निराला और सहयोगी वैज्ञानिकों रामानुज विश्वकर्मा, शिवशंकर आचार्या, एस.के. चौधरी और ए. लोकेश्वर रेड्डी ने 2021-22 से 2023-24 के बीच गहन प्रजनन और आणविक अनुसंधान के माध्यम से महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं।
विश्वविद्यालय ने तीसी की तीन नई किस्में विकसित की हैं: 'सबौर तीसी-2' में 42% से अधिक तेल प्रतिशत होता है और यह मध्यम अवधि की स्थिर उपज क्षमता वाली है। 'सबौर तीसी-3' अल्टरनेरिया ब्लाइट और पाउडरी मिल्ड्यू रोगों के प्रति उच्च सहनशीलता दर्शाती है। वहीं, 'सबौर तीसी-4' सूखा और ऊष्मा सहनशील है, जो इसे जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाती है। इन किस्मों का राष्ट्रीय स्तर पर प्रजनक बीज उत्पादन में 21.4% का सीधा योगदान है, जो किसी एक केंद्र के लिए एक असाधारण उपलब्धि मानी जाती है।
नैनो-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में, सबौर टीम ने फूल आने की अवस्था में नैनो-यूरिया (3 मिली/लीटर पानी) का पर्णीय छिड़काव करने की एक अभिनव तकनीक विकसित की है। इस तकनीक से नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (एनयूई) में 18-20% तक वृद्धि हुई है, जबकि रासायनिक उर्वरक की खपत में 25-30% तक कमी आई है, जिससे औसतन 12-15% तक उपज में वृद्धि दर्ज की गई है। इस उपलब्धि के लिए भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद द्वारा एक विशेष प्रशस्ति प्रमाण पत्र भी प्रदान किया गया है, जो सटीक पोषण प्रबंधन और जलवायु-लचीली कृषि का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
तीसी बीज ओमेगा-3 फैटी एसिड, α-लिनोलेनिक एसिड (एएलए), लिग्नैन और उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का एक समृद्ध स्रोत है। बीएयू द्वारा विकसित प्रजातियां कार्यात्मक खाद्य पदार्थ, औषधि, बायो-पेंट, वार्निश और पशु आहार के लिए अत्यंत उपयुक्त पाई गई हैं। विश्वविद्यालय के कुलपति, डी.आर. सिंह ने इस उपलब्धि पर कहा, बीएयू ने तीसी की नई किस्मों और जलवायु-सहनशील तकनीकों के क्षेत्र में देश में एक नया मानक स्थापित किया है। यह पुरस्कार हमारे बहुविषयी वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सतत नवाचार का जीवंत प्रमाण है।
जीनोमिक प्रजनन, नैनो-उर्वरक और सटीक पोषण प्रबंधन का यह समन्वित उपयोग तिलहन उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखता है। यह भारत की खाद्य तेल और पोषण सुरक्षा को मजबूत करेगा और किसानों की आय वृद्धि तथा कृषि-आधारित उद्योगों के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान देगा। बीएयू, सबौर अब भारत के 'राष्ट्रीय तिलहन नवाचार केंद्र' के रूप में उभर रहा है, जो देश को तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए मजबूत वैज्ञानिक आधार प्रदान कर रहा है।