बिहार सरकार ने कृषि योग्य भूमि की सेहत सुधारने और फसल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अपनी मिट्टी जाँच पहल को गति दी है। 25 सितंबर, 2025 को बिहार के उपमुख्यमंत्री-सह-कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने पटना में एक बयान जारी कर कहा कि किसानों को वैज्ञानिक आधार पर उर्वरकों के उपयोग के प्रति जागरूक करना इस अभियान का मुख्य उद्देश्य है। यह पहल रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी की उर्वरता को हो रहे नुकसान को रोकने और सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विजय कुमार सिन्हा के अनुसार, मिट्टी के नमूनों की जाँच के परिणामों के आधार पर उर्वरकों का संतुलित प्रयोग सुनिश्चित करने से न केवल कृषि योग्य भूमि की सेहत को बनाए रखा जा सकता है, बल्कि फसलों के उत्पादन और उत्पादकता में भी उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता प्रभावित हो रही है, जिसे रोकने के लिए मृदा परीक्षण एक अनिवार्य कदम है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए राज्य में 3 लाख मिट्टी नमूनों के संग्रहण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस लक्ष्य के मुकाबले, अब तक 2.41 लाख मिट्टी नमूने प्रयोगशालाओं में प्राप्त किए जा चुके हैं। इनमें से 1.20 लाख मिट्टी नमूनों का विश्लेषण करके किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराए गए हैं। किसानों को कार्ड उपलब्ध कराने में लगने वाले समय को कम करने के लिए एक नई पहल की गई है, जिसके तहत अब मृदा स्वास्थ्य कार्ड सीधे किसानों के मोबाइल पर व्हाट्सएप के माध्यम से भेजे जा रहे हैं।
यह मोबाइल-आधारित सुविधा किसानों को त्वरित जानकारी प्रदान कर रही है। "पहले कार्ड मिलने में कई हफ्ते लग जाते थे, अब व्हाट्सएप पर तुरंत मिल जाता है। इससे हमें फसल बोने से पहले ही पता चल जाता है कि कौन सी खाद कितनी मात्रा में डालनी है," एक स्थानीय किसान ने बताया। ऑनलाइन उपलब्ध स्वॉयल हेल्थ कार्ड में किसान अपनी आवश्यकतानुसार लगभग 106 विभिन्न फसलों के लिए वैज्ञानिक अनुशंसाएँ प्राप्त कर सकते हैं। यह सुविधा किसानों को सही फसल चयन और संतुलित पोषण प्रबंधन में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करेगी।
विजय कुमार सिन्हा ने विश्वास व्यक्त किया कि इस दूरगामी पहल से राज्य के किसान अधिक जागरूक और तकनीकी रूप से सशक्त बनेंगे। उनका मानना है कि मिट्टी की उर्वरता बनी रहेगी, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी, और यह बिहार की कृषि उत्पादकता को नए आयामों तक ले जाने में सहायक सिद्ध होगा। यह प्रयास राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है।