बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, पटना ने राज्य में पशुधन विकास और नस्ल सुधार को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की है। विश्वविद्यालय ने हाल ही में पटना के एक प्रगतिशील पशुपालक, यदुवेंद्र किशोर सिंह, के साथ डोनर एनिमल्स शेयरिंग एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का मुख्य लक्ष्य उच्च नस्ल और अधिक उत्पादकता वाले पशुओं की कमी को दूर करना है, जिसके तहत उत्कृष्ट डोनर पशुओं से भ्रूण एवं अंडाणु एकत्र कर उन्हें ग्राही पशुओं में प्रत्यारोपित किया जाएगा।
विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि उन्नत नस्ल के पशुओं की उपलब्धता सीमित है। इस कमी को पूरा करने के लिए, विश्वविद्यालय अब उन डोनर पशुओं से भ्रूण और अंडाणु एकत्र करेगा जो किसानों, निजी डेयरी फार्मों, गौशालाओं या सरकारी संस्थानों के पास उपलब्ध हैं। इन पशुओं में उत्कृष्ट नस्ल, ज्ञात वंशावली और श्रेष्ठ उत्पादन क्षमता जैसी विशेषताएँ होंगी। इन संग्रहित भ्रूणों को ग्राही पशुओं में प्रत्यारोपित करने से कम समय में अधिक संख्या में उच्च नस्ल के बछड़े प्राप्त किए जा सकेंगे, जिससे राज्य में पशुधन की गुणवत्ता में तीव्र सुधार होगा।
भारत सरकार और बिहार सरकार दोनों ही भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक को बढ़ावा देने, देशी नस्लों के संवर्धन व संरक्षण तथा अधिक उत्पादकता वाली पशुओं की संख्या बढ़ाने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही हैं। इस पहल से किसानों को उन्नत नस्ल के पशु उपलब्ध होंगे, जिससे दुग्ध उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सशक्त होगी। "उच्च गुणवत्ता वाले पशुधन की उपलब्धता से हमारे पशुपालकों की आय में निश्चित रूप से वृद्धि होगी, यह एक बड़ी उम्मीद है," एक अनुभवी पशुपालक ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा। यह समझौता किसानों को आधुनिक वैज्ञानिक प्रजनन तकनीकों से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करेगा।
इस अवसर पर, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. इंद्रजीत सिंह ने इसे किसानों को आधुनिक प्रजनन तकनीक से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया। उन्होंने कहा कि भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक से उच्च नस्ल की गायों एवं भैंसों की उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे न केवल दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा बल्कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। बिहार पशु चिकित्सा महाविद्यालय, पटना के डीन डॉ. जे.के. प्रसाद ने इस पहल को किसानों और विश्वविद्यालय के बीच तकनीकी सहयोग का नया अध्याय करार दिया, जिससे किसानों को सीधा लाभ मिलेगा और राज्य में पशुधन विकास की अपार संभावनाएँ साकार होंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समझौते राज्य के पशुपालकों के लिए अत्यंत सकारात्मक हैं। इनसे न केवल उच्च नस्ल के पशुओं की उपलब्धता बढ़ेगी बल्कि छोटे और मध्यम वर्गीय पशुपालकों तक भी आधुनिक तकनीक की पहुँच सुनिश्चित होगी। समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के समय विश्वविद्यालय के भ्रूण-प्रत्यारोपण सह-आईवीएफ प्रयोगशाला के इंचार्ज डॉ. दुष्यंत और विश्वविद्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी सत्य कुमार भी उपस्थित थे। यह पहल बिहार में पशुधन विकास के एक नए युग की शुरुआत का प्रतीक है।