भाकपा-माले और अखिल भारतीय किसान महासभा ने पटना सहित पूरे बिहार में अडानी के पीरपैंती पावर प्लांट के लिए सरकार द्वारा ₹1 प्रति एकड़ के भाव से दी गई 1050 एकड़ जमीन के फैसले के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रतिवाद सभाएं आयोजित कीं। पटना में, जीपीओ गोलंबर से विरोध मार्च निकला और पटना जंक्शन पर एक प्रतिवाद सभा के साथ संपन्न हुआ, जिसमें आरोप लगाया गया कि सरकार भूमिहीन गरीब परिवारों को आवास के लिए चार डिसमिल जमीन भी नहीं दे पा रही है, लेकिन कॉर्पोरेट घरानों को सस्ती दरों पर बड़ी ज़मीनें सौंप रही है।
पटना में आयोजित सभा को फुलवारी विधायक गोपाल रविदास, वरिष्ठ नेता के.डी. यादव, किसान महासभा राज्य सह सचिव राजेंद्र पटेल, जल्ला किसान संघर्ष समिति नेता शंभूनाथ मेहता और ऐक्टू नेता रणविजय कुमार ने संबोधित किया। के.डी. यादव ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मोदी सरकार ने बिहार को कॉर्पोरेट लूट के लिए खोल दिया है, विशेष रूप से अडानी जैसे बड़े समूहों के लिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जहां भूमिहीन गरीबों को आश्रय के लिए न्यूनतम जमीन नहीं मिलती, वहीं कॉर्पोरेटों को बाग-बगीचे वाली सैकड़ों एकड़ जमीन ₹1 प्रति एकड़ की सांकेतिक कीमत पर उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने मौजूदा एनडीए सरकार पर "जनता का साथ, अडानी का विकास" के नारे के तहत काम करने का आरोप लगाया।
गोपाल रविदास ने भागलपुर में प्रस्तावित अडानी के पावर प्रोजेक्ट को मोदी-नीतीश की डबल ठगी करार दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि फसली जमीन के अधिग्रहण से न केवल किसानों की आजीविका प्रभावित होगी, बल्कि गंगा के पानी का औद्योगिक दोहन बिहार के पूर्वांचल में एक नया जल संकट भी पैदा करेगा। उन्होंने परियोजना द्वारा सृजित होने वाली नौकरियों की संख्या पर भी सवाल उठाया, यह सुझाव देते हुए कि 10,000-12,000 मजदूरों के लिए अस्थायी और अल्पकालिक ठेका श्रम और संचालन काल में 3,000 नौकरियों का दावा अक्सर स्थानीय लोगों के लिए सीमित अवसर प्रदान करता है।
प्रतिवाद सभा में वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि यह भूमि अधिग्रहण केवल भागलपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे बिहार में एक व्यापक प्रवृत्ति है। उन्होंने कहा कि पहले के उद्योगों के ध्वस्त होने के बाद, सरकार अब नए उद्योग स्थापित करने के बहाने गरीबों और किसानों की थोड़ी-बहुत जमीन बिना उचित मुआवजे या बहुत कम मुआवजे पर छीन रही है, जिसे बाद में कॉर्पोरेट साझेदारों को सौंप दिया जा रहा है। इस संबंध में एक ग्रामीण कार्यकर्ता ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "हमारी खेती की ज़मीन हमारी रीढ़ है; इसे छीनकर आप न केवल हमारी आजीविका छीनते हैं, बल्कि हमारे बच्चों का भविष्य भी अंधकारमय कर देते हैं।" शेखपुरा जिले के चेवड़ा प्रखंड के हंसापुर-अस्थावां में भी ऐसी ही स्थिति का उल्लेख किया गया, जहां उद्योग के नाम पर 250 एकड़ जमीन औने-पौने दामों पर छीनी जा रही है, जिससे छोटे किसानों की पूरी खेती चौपट होने के कगार पर है।
किसान महासभा ने 20 सितंबर को इसी मुद्दे पर प्रदर्शन किया, जिसके दौरान शेखपुरा में एसडीओ और डीएम पर किसान नेताओं के साथ गाली-गलौज करने, आवेदन की रसीद फाड़ने और नेताओं को "गुंडा" कहने का आरोप लगाया गया। इसके परिणामस्वरूप चार किसान नेताओं पर मुकदमा दर्ज किया गया और उनके लाउडस्पीकर व टोटो जब्त कर लिए गए। इन घटनाओं को एनडीए सरकार के "तानाशाही" रवैये के रूप में निंदा की गई। पटना में प्रतिवाद सभा की अध्यक्षता रणविजय कुमार ने की और इसका संचालन राजेंद्र पटेल ने किया। कार्यक्रम में कमलेश कुमार, गुरुदेव दास, कृपा नारायण सिंह, मधेश्वर शर्मा, राजेश गुप्ता, संजय यादव, विनय कुमार, पन्नालाल सिंह, अनय मेहता, अनुराधा देवी, पुनीत पाठक, सत्येंद्र शर्मा, विभा गुप्ता, प्रमोद यादव सहित राज्य समिति के कई सदस्य शामिल थे। पटना के अलावा, नालंदा, आरा नगर, फतुहा, मसौढ़ी, जमुई, अरवल, नवादा, सिवान, बांका, समस्तीपुर, हाजीपुर और दरभंगा सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में भी ऐसी ही प्रतिवाद सभाएं आयोजित की गईं।
संक्षेप में, भाकपा-माले और अखिल भारतीय किसान महासभा के नेतृत्व में पूरे बिहार में व्यापक विरोध प्रदर्शनों ने अडानी के पीरपैंती पावर प्लांट के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और किसानों को कम मुआवजे के मुद्दे को उठाया है, आरोप लगाया गया है कि सरकार कॉर्पोरेट हितों का पक्ष ले रही है और भूमिहीन गरीबों की उपेक्षा कर रही है।